Shankaracharya Politics: धर्म के ‘सर्वोच्च पद’ पर सियासत का ग्रहण? माघ मेला विवाद से राम मंदिर तक… जानें कैसे ‘हथियार’ बना भगवा

Patrakar Babu News Desk
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प्रयागराज/नई दिल्ली: सनातन धर्म में आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार पीठें (ज्योतिर्मठ, द्वारका, पुरी, शृंगेरी) सर्वोच्च मानी जाती हैं। लेकिन, 21वीं सदी के भारत में यह पवित्र पद धार्मिक आस्था से ज्यादा राजनीतिक रस्साकशी का केंद्र बन गया है। 2026 का आगाज होते ही प्रयागराज माघ मेला (Magh Mela 2026) में एक नया विवाद खड़ा हो गया है, जिसने एक बार फिर यह सवाल उठा दिया है—क्या शंकराचार्य पद अब ‘पॉलिटिकल टूल’ बनकर रह गया है?

18-19 जनवरी को मौनी अमावस्या के मौके पर ज्योतिर्मठ के दावेदार Swami Avimukteshwaranand Saraswati को शाही स्नान से रोका गया, जिसके बाद पुलिस और संतों के बीच झड़प हुई। यूपी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए उनके ‘शंकराचार्य’ टाइटल पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। लेकिन, इसके पीछे की कहानी सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि गहरी राजनीतिक है।

1. माघ मेला 2026: शाही स्नान पर रोक या ‘सियासी बदला’?

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और योगी सरकार के बीच तनातनी ने सियासी रंग ले लिया है। प्रशासन का तर्क है कि उत्तराधिकार का मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित (Pending) है, इसलिए वे खुद को शंकराचार्य नहीं कह सकते। वहीं, कांग्रेस ने इसे बीजेपी का ‘धर्मद्रोह’ करार दिया है।

सियासी पंडितों का मानना है कि स्वामी को इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि उन्होंने अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा (Ram Mandir Consecration) पर सवाल उठाए थे और केदारनाथ में ‘228 किलो सोना चोरी’ का मुद्दा उठाया था। दिलचस्प बात यह है कि 2023 में इन्हीं स्वामी ने राहुल गांधी को ‘मनुस्मृति अपमान’ पर हिंदू धर्म से बहिष्कृत करने की बात कही थी, लेकिन आज कांग्रेस उनके समर्थन में खड़ी है। यह ‘राजनीतिक अवसरवाद’ (Political Opportunism) का सबसे बड़ा उदाहरण है।

2. राम मंदिर विवाद (2024): ‘बागी’ शंकराचार्य vs बीजेपी

जनवरी 2024 में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के दौरान ज्योतिर्मठ और पुरी शंकराचार्य (स्वामी निश्चलानंद सरस्वती) ने कार्यक्रम का बहिष्कार किया था। उनका तर्क था कि “अधूरे मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा शास्त्रों के खिलाफ है।” बीजेपी और VHP ने इसे राजनीतिक विरोध बताया, जबकि विपक्ष ने इसे धार्मिक सत्य कहा। यह घटना साफ करती है कि कैसे धार्मिक नियम अब ‘वोट बैंक’ की कसौटी पर तौले जाने लगे हैं।

3. कांची मठ गिरफ्तारी (2004): जब संत बने ‘सियासी शिकार’

इतिहास गवाह है कि राजनीति ने मठों को कभी नहीं बख्शा। 2004 में दिवाली के दिन कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य Jayendra Saraswati को जयललिता सरकार ने ‘संकररामन हत्या केस’ में गिरफ्तार किया था। इसे हिंदू संतों का बड़ा अपमान माना गया। सालों बाद 2013 में वे निर्दोष साबित हुए, लेकिन तब तक यह घटना तमिलनाडु की राजनीति में DMK और AIADMK के लिए चुनावी हथियार बन चुकी थी।

4. उत्तराधिकार की जंग: 1953 से अब तक

शंकराचार्य पद का राजनीतिकरण 1953 में स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती के निधन के बाद शुरू हुआ। ज्योतिर्मठ के उत्तराधिकार को लेकर स्वामी स्वरूपानंद, वासुदेवानंद और अब अविमुक्तेश्वरानंद के बीच अदालती लड़ाई जारी है। पार्टियां अपनी सुविधा के अनुसार अलग-अलग दावेदारों का समर्थन करती हैं।

निष्कर्ष: आदि शंकराचार्य ने जिन पीठों की स्थापना धर्म की रक्षा के लिए की थी, आज वे खुद ‘संरक्षण’ के लिए राजनेताओं की मोहताज हो गई हैं। कहीं जमीनी विवाद है, तो कहीं गद्दी की लड़ाई। जब तक धर्मगुरु खुद को सत्ता के गलियारों से दूर नहीं रखेंगे, भगवा पर सियासत के दाग लगते रहेंगे।

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