शेखपुरा जिले के सदर प्रखंड अंतर्गत कोसरा पंचायत के जीएनबीघा गांव में प्रशासन की एक नोटिस ने हड़कंप मचा दिया है। अंचलाधिकारी (CO) ने गांव के पोखर (Pond) पर अवैध रूप से बने 45 घरों को खाली करने और उन्हें तोड़ने का Official Notice जारी किया है। सोमवार को दो दर्जन से अधिक आक्रोशित ग्रामीण अपनी शिकायत लेकर समाहरणालय (Collectorate) पहुंचे और जिलाधिकारी (DM) से इस कार्रवाई को रोकने की गुहार लगाई। हैरानी की बात यह है कि ये घर किसी निजी फंड से नहीं, बल्कि सरकारी योजना Indira Awas के तहत मिली राशि से बनाए गए थे। ग्रामीणों का कहना है कि अगर ये निर्माण अवैध थे, तो सरकार ने इनके लिए Financial Assistance क्यों जारी की? अब अचानक आए बेदखली के आदेश से दर्जनों गरीब परिवार खुले आसमान के नीचे आने को मजबूर हैं।
Indira Awas की राशि से बना मकान अब ‘अवैध’ कैसे?
ग्रामीणों ने समाहरणालय में प्रदर्शन करते हुए बताया कि जीएनबीघा के इन 45 परिवारों को वर्षों पहले Indira Awas Yojana का लाभ मिला था। रामफल पासवान और रूना देवी समेत अन्य ग्रामीणों का कहना है कि सरकार द्वारा दी गई राशि से ही उन्होंने पोखर की जमीन पर आशियाना खड़ा किया था। तब किसी अधिकारी ने उन्हें नहीं रोका, लेकिन अब Encroachment (अतिक्रमण) का हवाला देकर इसे ढहाने की तैयारी की जा रही है। ग्रामीणों ने प्रशासन पर पक्षपात का भी आरोप लगाया है। उनका तर्क है कि जिले में कई अन्य स्थानों पर भी पोखर और सरकारी जमीन पर अवैध रूप से Residential Buildings बनी हुई हैं, लेकिन प्रशासन केवल उनके गांव को निशाना बना रहा है। ग्रामीणों की मांग है कि या तो उनके घर न तोड़े जाएं, या उन्हें किसी अन्य स्थान पर Alternative Housing उपलब्ध कराई जाए।
प्रशासनिक लापरवाही और पुनर्वास की मांग
इस मामले ने अब तूल पकड़ लिया है क्योंकि इसमें सरकारी धन का उपयोग ‘अवैध जमीन’ पर निर्माण के लिए किया गया है। यह Administrative Negligence का एक बड़ा उदाहरण है कि आखिर फंड जारी करने और Physical Verification के समय जमीन की वैधानिकता की जांच क्यों नहीं की गई? ग्रामीणों ने DM को सौंपे अपने ज्ञापन में स्पष्ट किया है कि बिना पुनर्वास (Rehabilitation) के वे अपने घर खाली नहीं करेंगे। फिलहाल, जिला प्रशासन ने ग्रामीणों के आवेदन पर विचार करने का आश्वासन दिया है। लेकिन Demolition Notice की समय सीमा नजदीक होने के कारण गांव में तनाव का माहौल है। अब यह देखना लाजमी होगा कि प्रशासन इन 45 परिवारों को बेघर होने से बचाने के लिए क्या बीच का रास्ता निकालता है या फिर सरकारी खर्च पर बने इन मकानों पर ‘बुलडोजर कार्रवाई’ जारी रहेगी।


