न्यूयॉर्क/नई दिल्ली: सीमा पार से आतंकवाद को पनाह देना अब पाकिस्तान को भारी पड़ रहा है। भारत ने आतंकवाद के खिलाफ अपनी रणनीति बदलते हुए जब से ‘सिंधु जल संधि’ (Indus Waters Treaty – IWT) को ठंडे बस्ते में डाला है, पाकिस्तान की सांसें अटक गई हैं।
हाल ही में संयुक्त राष्ट्र (UN) के मंच पर पाकिस्तान का यह दर्द छलक पड़ा। पाकिस्तान ने भारत के इस कदम को अपनी सुरक्षा के लिए “अभूतपूर्व संकट” (Existential Threat) बताया है और दुनिया से हस्तक्षेप की मांग की है।
UN में क्या बोला पाकिस्तान?
संयुक्त राष्ट्र में आयोजित ‘ग्लोबल वाटर बैंकरप्सी पॉलिसी राउंडटेबल’ (Global Water Bankruptcy Policy Roundtable) के दौरान पाकिस्तान के कार्यवाहक स्थायी प्रतिनिधि, राजदूत उस्मान जादून ने भारत पर गंभीर आरोप लगाए।
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आरोप 1: भारत ने अप्रैल (पिछले साल) में 1960 की संधि को एकतरफा निलंबित कर दिया है, जो अवैध है।
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आरोप 2: भारत ने न केवल पानी के बहाव में बाधा डाली है, बल्कि जल स्तर से जुड़ा महत्वपूर्ण डेटा (Hydrological Data) साझा करना भी बंद कर दिया है।
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आरोप 3: भारत पानी को एक ‘हथियार’ (Weapon) के रूप में इस्तेमाल कर रहा है, जिससे क्षेत्रीय स्थिरता खतरे में है।
भारत का दो टूक जवाब: ‘खून और पानी साथ नहीं बह सकते’
भारत ने यह सख्त कदम बेवजह नहीं उठाया है। यह कार्रवाई जम्मू-कश्मीर के पहलगाम (Pahalgam) में हुए भीषण आतंकी हमले का जवाब है, जिसमें पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों ने 26 निर्दोष नागरिकों की हत्या कर दी थी।
भारत ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है:
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आतंकवाद पर प्रहार: दशकों तक भारत ने संधि का पालन किया, लेकिन पाकिस्तान ने बदले में आतंकवाद दिया।
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नीति: भारत का स्पष्ट मानना है कि “खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते।” जब तक सीमा पार से आतंकवाद बंद नहीं होता, संधियों का सामान्य रूप से चलना संभव नहीं है।
क्या है 1960 की सिंधु जल संधि?
यह संधि विश्व बैंक (World Bank) की मध्यस्थता में 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई थी। इसके तहत 6 प्रमुख नदियों को दो हिस्सों में बांटा गया था:
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पश्चिमी नदियां (पाकिस्तान के हिस्से): सिंधु (Indus), झेलम और चिनाब। (भारत इनका पानी कृषि और बिजली के लिए सीमित रूप से ही उपयोग कर सकता है)।
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पूर्वी नदियां (भारत के हिस्से): रावी, ब्यास और सतलज। (इनका पूरा पानी भारत का है)।
विडंबना यह है कि इस संधि के तहत सिंधु नदी प्रणाली का लगभग 80% पानी पाकिस्तान को मिलता है, जबकि भारत के पास केवल 20% उपयोग का अधिकार है। इसके बावजूद पाकिस्तान भारत की हर जल विद्युत परियोजना में रोड़े अटकाता रहा है।
पाकिस्तान का अपना कुप्रबंधन
मंच पर सहानुभूति बटोरने की कोशिश के बीच, पाकिस्तानी राजदूत ने दबी जुबान में अपने देश की आंतरिक समस्याओं को भी स्वीकार किया। पाकिस्तान एक ‘लोअर-रिपेरियन’ देश है और वहां जल संकट गहराता जा रहा है:
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ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं।
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भूजल स्तर (Groundwater) सूख रहा है।
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बाढ़ और सूखे की मार से कृषि और ऊर्जा क्षेत्र बर्बाद हो रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के डेटा रोकने से पाकिस्तान को बाढ़ की पूर्व चेतावनी (Early Warning) मिलने में दिक्कत होगी, जिससे वहां तबाही का खतरा बढ़ सकता है।


