प्रयागराज: माघ मेला 2026 (Magh Mela) में शाही स्नान को लेकर शुरू हुआ विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती (Swami Avimukteshwaranand) और यूपी प्रशासन के बीच चल रही तनातनी में अब पद्म विभूषण Jagadguru Rambhadracharya की एंट्री हो गई है। रामभद्राचार्य ने इस पूरे मामले में प्रशासन का पक्ष लेते हुए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ही गलत ठहरा दिया है।
बुधवार को पत्रकारों से बातचीत के दौरान रामभद्राचार्य ने दो टूक शब्दों में कहा, “स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के साथ कोई अन्याय नहीं हुआ है, बल्कि अन्याय उन्होंने खुद किया है।” रामभद्राचार्य ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा अविमुक्तेश्वरानंद को ‘शंकराचार्य’ (Shankaracharya) टाइटल के इस्तेमाल पर दिए गए Notice को भी पूरी तरह जायज और सही बताया है।
‘नियम सबके लिए बराबर, हम भी पैदल जाते हैं’
प्रशासन की कार्रवाई का बचाव करते हुए जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने मेले के नियमों (Rules) का हवाला दिया। उन्होंने कहा, “नियम यह है कि रथ या वाहन से गंगा घाट तक नहीं जाया जा सकता। पुलिस ने उन्हें रोका तो सही किया। हम खुद भी संगम तक पैदल ही जाते हैं।”
रामभद्राचार्य ने कहा कि जब कोई मामला Supreme Court में लंबित (Sub-judice) हो, तो उस पद का दावा करना या टाइटल का उपयोग करना वैधानिक रूप से गलत है। उन्होंने कहा कि यूपी सरकार ने नोटिस देकर उनसे जो सवाल पूछे हैं, वे नियम सम्मत हैं। इस बयान ने संतों के बीच चल रही ‘सियासी और धार्मिक’ जंग में आग में घी डालने का काम किया है।
Avimukteshwaranand का 8 पन्नों का जवाब: ‘मैं ही हूं शंकराचार्य’
दूसरी तरफ, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने प्रशासन के नोटिस के आगे झुकने से इनकार कर दिया है। मंगलवार को मेला प्राधिकरण ने नोटिस भेजकर पूछा था कि जब मामला कोर्ट में है, तो वे खुद को ‘ज्योतिष्पीठ का शंकराचार्य’ कैसे बता रहे हैं?
इसके जवाब में बुधवार को स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से 8 Pages का एक विस्तृत लीगल जवाब भेजा गया। अपने जवाब में उन्होंने दावा किया है कि वे ही असली शंकराचार्य हैं और उनके पट्टाभिषेक (Coronation) की प्रक्रिया शास्त्र सम्मत हुई है। उन्होंने प्रशासन पर धार्मिक कार्यों में बाधा डालने का आरोप लगाते हुए अपने अधिकार (Rights) की बात दोहराई है।


