नई दिल्ली: विद्या, कला और संगीत की देवी मां सरस्वती (Maa Saraswati) की आराधना का सबसे बड़ा पर्व ‘बसंत पंचमी’ कल यानी 23 जनवरी 2026, शुक्रवार को मनाया जाएगा। इस बार यह पर्व बेहद खास है क्योंकि शुक्रवार के साथ Shiv Yog (शिव योग) और उत्तरभाद्रपद नक्षत्र का अद्भुत संयोग बन रहा है।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इस शुभ संयोग में मां शारदा की पूजा करने से साधक की रचनात्मकता (Creativity) और ज्ञान में अपार वृद्धि होती है। आइए जानते हैं बसंत पंचमी की पौराणिक कथा, पूजा की सही विधि और छात्रों के लिए सफलता के अचूक उपाय।
Saraswati Puja Vidhi: कैसे करें मां की आराधना?
शुक्रवार की सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और संभव हो तो पीले या सफेद वस्त्र धारण करें।
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स्थापना: पूजा घर या पंडाल को गंगाजल से शुद्ध करें। एक चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर मां सरस्वती की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
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श्रृंगार: मां को चंदन का तिलक लगाएं और केसर, रोली, हल्दी, पीले फूल (Yellow Flowers) व अक्षत अर्पित करें।
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भोग: देवी शारदा को बूंदी, बेसन के लड्डू, मिश्री, दही और हलवा का भोग लगाएं। केसरिया भात (मीठे चावल) का भोग श्रेष्ठ माना जाता है।
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छात्रों के लिए नियम: विद्यार्थी अपनी कलम, कॉपी और किताबें मां के चरणों में अर्पित करें। ध्यान रहे, इन किताबों को पूजा वाले दिन न पढ़ें और अगले दिन ही वहां से उठाएं।
Students Special: सफलता का महामंत्र
बसंत पंचमी विद्यार्थियों के लिए वरदान समान है। इस दिन छात्रों को पूरी श्रद्धा के साथ मां सरस्वती के मूल मंत्र का 108 बार जाप करना चाहिए।
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मंत्र: “ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः”
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लाभ: इससे एकाग्रता (Concentration) बढ़ती है और विद्या, विवेक व बुद्धि का विकास होता है।
Basant Panchami Katha: जब ब्रह्मांड में गूंजा पहला स्वर
पौराणिक कथाओं के अनुसार, सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा ने जब ब्रह्मांड बनाया, तो वह बिल्कुल शांत और नीरस था। चारों तरफ सन्नाटा था। ब्रह्मा जी ने भगवान विष्णु से अपनी परेशानी साझा की। विष्णु जी के सुझाव पर ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल से जल छिड़का, जिससे एक अद्भुत देवी प्रकट हुईं। उनके हाथों में वीणा थी।
ब्रह्मा जी के अनुरोध पर जैसे ही देवी ने वीणा के तार छेड़ें, उससे ‘सा’ शब्द का नाद हुआ। यही संगीत का पहला स्वर था। इस ध्वनि से मूक ब्रह्मांड में प्राण आ गए और सब कुछ गुंजायमान हो गया। प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उनका नाम ‘वागेश्वरी’ और ‘वीणापाणि’ रखा। वह दिन बसंत पंचमी का ही था।
Tilakotsav: शिव जी के तिलक की परंपरा
बसंत पंचमी का संबंध सिर्फ सरस्वती पूजा से नहीं, बल्कि भगवान शिव (Lord Shiva) से भी है। विशेषकर मिथिला और देवघर में इस दिन महादेव के ‘तिलकोत्सव’ की परंपरा है। मान्यता है कि इस दिन माता पार्वती के मायके वाले भोलेनाथ का तिलक चढ़ाने आते हैं। शिव मंदिरों में शिवलिंग पर अबीर, गुलाल, नए धान की बाली और आम के मंजर (बौर) चढ़ाकर फाल्गुन मास के आने का स्वागत किया जाता है।
(डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारी पौराणिक मान्यताओं और धार्मिक आस्था पर आधारित है। हम इसकी पूर्ण सत्यता का दावा नहीं करते।)


