Hindu Dharma: पिता के रहते बेटे को भूलकर भी नहीं करने चाहिए ये 5 काम, वरना नाराज हो जाएंगे देवता!

Patrakar Babu News Desk
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नई दिल्ली: सनातन धर्म (Sanatan Dharma) में पिता को सिर्फ परिवार का मुखिया ही नहीं, बल्कि ‘जीवित देवता’ और गुरु का दर्जा दिया गया है। शास्त्रों के अनुसार, जिस घर में पिता का सम्मान होता है, वहां देवता वास करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि पिता के जीवित रहते हुए पुत्र के लिए कुछ कार्य सख्त वर्जित (Prohibited) माने गए हैं?

गरुड़ पुराण और धर्म शास्त्रों के मुताबिक, अगर पिता जीवित हैं, तो बेटे द्वारा किए गए कुछ विशेष कार्य न केवल ‘पितृ दोष’ (Pitra Dosh) का कारण बनते हैं, बल्कि इससे परिवार की सुख-शांति भी छिन सकती है। आइए जानते हैं वो 5 काम जो पिता के रहते पुत्र को कभी नहीं करने चाहिए।

1. तर्पण और पिंडदान (Pind Daan) न करें

शास्त्रों का सबसे कड़ा नियम यह है कि पिता के जीवित रहते हुए पुत्र को कभी भी अपने दादा-परदादा या पूर्वजों का श्राद्ध, तर्पण या पिंडदान स्वयं नहीं करना चाहिए।

  • नियम: यह अधिकार केवल पिता का होता है।

  • नुकसान: यदि पुत्र ऐसा करता है, तो इसे पितृ ऋण का उल्लंघन माना जाता है और पूर्वजों की आत्मा को शांति नहीं मिलती।

2. मूंछ मुंडवाना (Shaving Moustache)

हिंदू परंपराओं में मूंछ को पिता के सम्मान और परिपक्वता का प्रतीक माना जाता है। पुरानी मान्यताओं के अनुसार, पुत्र अपनी मूंछें केवल पिता के निधन के बाद ही मुंडवाता था (शोक के समय)।

  • परंपरा: पिता के जीवित रहते मूंछ मुंडवाना अपशकुन और अनादर माना जाता है। हालांकि, आधुनिक दौर में यह नियम शिथिल हुआ है, लेकिन पारंपरिक परिवारों में आज भी इसका पालन होता है।

3. प्रमुख यजमान बनना (Yagya Leadership)

घर में कोई भी बड़ा धार्मिक अनुष्ठान, यज्ञ, हवन या पूजा हो रही हो, तो उसका नेतृत्व (Main Yajman) हमेशा पिता को ही करना चाहिए।

  • भूमिका: पुत्र को हमेशा पिता के सहायक (Assistant) के रूप में बैठना चाहिए, न कि मुख्य कर्ता के रूप में। पिता के रहते खुद को ‘मुखिया’ साबित करना धार्मिक दृष्टि से गलत है।

4. अपने नाम से ‘दान’ करना

दान-पुण्य करना अच्छी बात है, लेकिन शास्त्रों के अनुसार, अगर पिता जीवित हैं तो पुत्र को कोई भी बड़ा दान (Donation) अपने नाम के बजाय पिता के नाम से करना चाहिए।

  • लाभ: इससे पिता का मान-सम्मान बढ़ता है और पुत्र को दोगुना पुण्य मिलता है। अपना नाम आगे रखने से पारिवारिक अनुशासन भंग होता है।

5. निमंत्रण पत्र में नाम की मर्यादा

किसी भी शुभ कार्य, शादी-विवाह या समारोह के निमंत्रण पत्र (Invitation Card) में पुत्र का नाम पिता से ऊपर नहीं होना चाहिए।

  • शिष्टाचार: सबसे पहले घर के मुखिया यानी पिता का नाम होना चाहिए। यह नियम परिवार में सामंजस्य और बड़ों के प्रति आदर भाव को दर्शाता है।

(डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और शास्त्रों पर आधारित है। हम इसकी सत्यता की पुष्टि नहीं करते। किसी भी नियम के लिए अपने कुलगुरु या विशेषज्ञ की सलाह लें।)

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